Tuesday, January 17, 2012

हम, आप , वादे, कसमें और एक तडपता सा सच...

आप एक सपना था...
खुली आखों से देखा एक अबूझ सा सपना...
सात समंदर पार से आने वाली एक परी
जो बरसों बरस, मेरी साँसों मैं जीवित रही...
मेरी भावनाओं मैं व्यक्त होती रही ...
और नज़रों के सामने रही...
न होते हुए भी ५ साल तक सामने रही....
बातें करते रहे, हँसते रहे, रोते रहे.
खुश भी रहे, दुखी भी रहे...
शायद कुछ ख़ास नहीं था.... हमारी लव स्टोरी में...
वायदे किये, कसमें खाई....
अब के मजबूरी है जान...
आओगे तो कभी मत जाना 
अगर जाना पड़े तो जाना और वापिस आ जाना....
और आपने स्वीकृति दे दी हमें...
और लगा मानो सब कुछ पा लिया हो ...
जानते थे दूरियां, फासले बड़ा देती है...
कुछ भी न होते हुए भी , गलतफहमियां दे देती हैं....
फिर एक दिन सुन्दर सपना टूटा...
और आप चले गए...
बहुत रोया था उस दिन में...
आँखों से गिरते हुए नमकीन पानी से शर्ट सराबोर थी...
तकलीफ थी कुछ दिनों के लिए ही गए हो, लेकिन क्यूँ गए हो ...
बिना गए नहीं चल सकता था क्या....
फिर आप वहीँ के हो के रह गए...
कभी इस लिए, कभी उस लिए...
आप का आना न हो सका 
दिन हफ्ते, महीने और कई मौसम चले गए...
लेकिन आप न आ सके...
शायद वो स्वीकृति अप्रासंगिक हो गई थी...
हमारी चाहतों पर आपकी इच्छाएं भारी पड़ी ...
और आप आ न सके...
एक बरस होने को है...
अब तो मेरे प्यार को भी शक की नज़र से देखते हो आप....
अब तो ये सच भी तडपता सा है कि मैं आप से मोहब्बत करता हूँ. 
क्या करूँ कि तुम्हे यकीन हो जाए,



अखियों को रहने दे, अखियों के आस पास...

अखियों को रहने दे, अखियों के आस पास...

रिश्ते......

दूरियां रिश्तों मैं दरार दाल देती है....
लिखे हुए शब्द और उनका समझा हुआ मतलब बहुत अलग हो सकता है...

मैंने कहा कुछ और था, और तुम समझे कुछ और....
मैं तेरी तरफ को जो बड़ा, तू चल दी दूसरी और..

रिश्ते बहुत उलझे से होते है,
लेकिन फिर भी ....
अगर कोई हर बार दिल से ही सोचे.
और आपके कहे शब्दों का सरलार्थ अपने ही हिसाब से करे ..
तो आप क्या कर सकते हैं....
अर्थ का अनर्थ होने में वक्त कितना लगता हैं....
शायद कुछ ही पल, या फिर उस से भी पहले....

मैं अपना सब कुछ ख़तम कर के भी आप से मोहब्बत करता हूँ....
अपना सब कुछ आप से कहता हूँ...
क्या आप करते हो?




Tuesday, December 27, 2011

गुनाह इतना है बस मेरा, कि तुझ से प्यार करता हूँ

गुनाह इतना है बस मेरा,   कि तुझ से प्यार करता हूँ
तू समझे या नहीं समझे, तेरा ही इन्तेज़ार करता हूँ.
उन सारे पलों में में, तुझे ही याद करता हूँ...
अब आये कि तब आये, येही इन्तेज़ार करता हूँ.

किसी भूले किस्से के मानिंद, तुम अक्सर भूल जाती हो.
संदेशे मिल नहीं पाते,  सामने आ न पाते हो...
दुःख हो अगर फिर भी, प्यार का इज़हार करता हूँ..
तू समझे या नहीं समझे, तेरा ही इन्तेज़ार करता हूँ.
गुनाह इतना है बस मेरा,   कि तुझ से प्यार करता हूँ

Wednesday, November 30, 2011

भगवन सुन रहे हो क्या....

ये मन भी कितना चंचल है...
तो तुम से मिलना चाहता है...
कुछ दुःख एकाकीपन के मेरे..
कुछ विरह की काली नदियाँ हैं..
कुछ स्याह रात के अँधेरे....
गोया बीत कई कुछ सदियाँ हैं...
भूल भाल कर मैं सब कुछ ,
साथ जो तेरा चाहता हूँ,

तेरी जुल्फों की छाँव तले ..
 कुछ हंसना रोना चाहता है...

आप हॉस्पिटल में हो
मैं इधर हूँ,
हजारों मील दूर,
सातों समन्दरों पार...
चाह कर भी तुम्हारे पास नहीं हो सकता....
भगवन सुन रहे हो क्या....
करोगे मुझे पर तरस?

अजीब है. लेकिन सच है....

पता नहीं क्यूँ मन बेचैन सा क्यों है....
आज फिर ऑफिस से एक दोस्त ने नौकरी छोड़ी और नए ठिकाने की और प्रस्थान कर दिया
हालाँकि मैं खुद कई नौकरियां छोड चुका हूँ...
जब पहली बार छोड़ी थी तब तो काफी तकलीफ हुई थी..
उस के बाद कभी कुछ महसूस ही नहीं हुआ...
लेकिन , जब कोई साथी छोड़ता है तो महसूस होता है...
नहीं जानता छोड़ने वाले क्या सोचते होंगे...
अजीब है. लेकिन सच है....

Tuesday, November 29, 2011

जिंदगी लाइव - मुंबई हमलों के ३ साल बाद - प्रथम भाग

भाग १ 

भाग २

भाग ३

भाग ४

भाग ५

भाग ६


भाग ७

भाग ८

Monday, November 28, 2011

इन्तेज़ार जारी है....

५ मार्च २००५: पहली बार ऑनलाइन मिलना 
जुलाई २००५: पहली दफा देखना 
२९ सितम्बर २००६: पहली बार आमने सामने मिले...
३० नवम्बर २००६: बिछुडना.  कभी वापिस मिलने के लिए...
४ साल के लिए दूर हो जाना 
२४ सितम्बर २०१०: ४ लंबे सालों के बाद मिलना...
१०-१०-१०: कभी न बिछुड़ने के वादों के साथ शादी 
२-मार्च-२०११: फिर से बिछुड जाना ....

इन्तेज़ार जारी है....

क्या कसूर है हमारा...

सब कुछ उदास है आज कल...
सूरज जैसे चढ़ता ही नहीं 
हर तरफ अँधेरा ही पसरा रहता है....
उम्मीद, जैसे दूर का कुछ लगता हैं....
उम्मीद मिल पाने की 
उम्मीद हंस पाने की 
उम्मीद जल्दी से एक हो पाने की 
जानता हूँ खुश तुम भी नहीं हो ...
खुश तो में भी नहीं हूँ 
क्या भगवन को नहीं लगता की हम एक हो सकें...
हम भी अपनी खुशिओं बाँट सकें .
मैं भी अपने अंश को जनम लेता देख सकूँ 
उठा सकूँ अपनी गोद मैं, और पुचकार सकूँ...
क्या कसूर है हमारा...

Monday, October 31, 2011

आगे का सोचिये, सोच के ही डर लगता है....

शायद ज़िन्दगी मैं किसी भी इंसान को बहुत तकलीफ होती है , जब वो अपने आप पर से हटकर आगे बढता है और समाज के लिए सोचता है...
शायद ये बात उतनी तकलीफदेह न हो , उन लोगों के लिए जो की विकसित देशों के रहने वाले हों..
या फिर उन मुल्कों के बाशिदों को मेरी बात अजीब सी लगे, जिनके नेताओं की सोच जिंदा हों और जो अपने देश केलिए सोचते हों....
शायद कुछ लोग मुझे पागल भी समझें....
आप अपने आप से थोडा आगे बढ़ कर सोचें... तो आने वाला भविष्य अंधकारमय दीखता हैं 
हम सब, सब भारतीय मौलिक रूप से बेईमान हैं.....
सुनने मैं कितना अजीब सा लगता है न...
लेकिन ये सच हैं....
सुनिए....
सब्जी वाला, सब्जी को टीका लगता है ताकि घीया, कद्दू  ज्यादा बड़े हो जाएँ....
फल बेचने वाला, अपने सेब के ऊपर लाल रंग की और आम के ऊपर पीले रंग की बत्ती लगते हैं....
किराने वाला चाय पत्ती मैं घोड़े की लीद मिलते हैं....
दूध वाले दूध मैं यूरिया मिला रहे हैं....
मिठाई वाले , दीवाली के दिन मैं घटिया और महंगी मिठाई दे रहे हैं....
कार वाले बाबु जी, लाल बत्ती का उल्लंघन करने के बाद जब पकडे जाते हैं तो पुलिस वाले से कहते हैं. "जानते हो मैं कौन हूँ "
मंत्री जी वाली गाडी, गलत साइड से गाडी, लाल बत्ती का उल्लंघन करते हुए निकल जाती है....
हर दफ्तर का बाबु, रिश्वत चाहता है, 
और हर आम आदमी , अपना गलत काम करवाने के लिए, या फिर सही काम भी  जल्दी से जल्दी करवाने के लिए रिश्वत देना अच्छा समझता है.....
तो फिर , मेरे भाई कहिये, हम लोग हुए की नहीं मौलिक तौर पे बेईमान ...
अब ये तो आज का नज़ारा है....
आगे का सोचिये,
सोच के ही डर लगता है....

Thursday, October 13, 2011

वह ये हुई न मौत.....

चुपके से मर जाना कितना तकलीफदेह होता है ...
नहीं तो.... ये तो किस्मत वालों को मिलती है...
बिना तडपे, बिना किसी दर्द से...
चुप चाप सी मौत....
पीछे से कोई रोने वाला नहीं....
जो जी कर किसी के काम न आये...
वो मर कर काम की चीज़ हो गए....
हस्पताल के लिए लावारिस लाश, 
जिस पर वो प्रयोग कर सकते हैं 
उस देश मैं जिस मैं कोई अपना कोई अंग दान नहीं करता....
वहां पे सारे अंग ही मुफ्त मैं दान हो गए...
वह ये हुई न मौत.....

Thursday, September 22, 2011

तमाम उम्र चले और तेरा घर नहीं आया

आज ज़िन्दगी के ३२ बरस बीत गए....
आधी से ज्यादा ज़िन्दगी बीत चुकी है 
और ज़िन्दगी के सुनहरी बरस भी बीत गए...
वो पल जब बहुत खुशियाँ हो सकती थी..
वो पल जब मैं ऊर्जा से भरपूर था... 
बहुत घूम फिर, नाच कूद सकता था..
वो पल चले गए, खुद को सेट करने के चक्कर मैं...
जिंदा रहने की ज़रूरतों ने कभी और कुछ करने ही नहीं दिया....
और जब ज़रूरतें पूरी होने लगी... तब वक्त ही बीत गया...
तुम से प्यार किया, और इंतज़ार किया....
हमारी ज़िन्दगी के बहुत से साल बीत गए....
जब मिले , फिर कुछ पलों के बाद तुम भी दूर हो गए....
आज भी ज़रूरतें अधूरी है...
और ये ज़रूरतें , अय्याशी की नहीं है....
ये ज़रूरतें है जिंदा रहने की....
आज भी चलता जा रहा हूँ, 
बात फिर वही निकली 
तमाम उम्र चले, और तेरा घर नहीं आया ....
तमाम हिजर किये, फिर भी तेरा घर नहीं आया 

Wednesday, September 14, 2011

लड़का है बड़ा अजीब सा

वो लड़का भी बड़ा अजीब सा था...
थोडा सा इमोशनल , और थोडा सा लल्लू 
लड़की को याद करता तो आँखें भर आती....
एक वक्त था इसलिए आँखें भर आती थी, की पता न था की मिल भी सकेंगे की नहीं 
अब इस लिए भर आती हैं... की मिल कर फिर जुदा हुए.. 
अब इन आखों का क्या कुसूर 
ये तो दिल के नासूर, बहते रहते हैं. 
जब उस की बात सुनता तो 
मानो दुनिया बहुत खुशगवार लगती 
लगता मानो सब अच्छा ही अच्छा है 
हर दिन सावन, रात दीवाली 
और सब तरफ खुशियाँ 
छटाक.... ये क्या हुआ...
अरे ये तो सपना था 
लड़की तो दूर है 
सात समंदर पार....
और वो साथ हो के भी अकेला है 
पा कर भी प्यासा है....
जिंदा हो के भी मुर्दा है....
लड़की आएगी, तो शायद 
इस मुर्दे मैं भी जान आ जाए 
पर एक बात पक्की है...
लड़का है बड़ा अजीब सा 

Thursday, August 4, 2011

आज बहुत दिनों बाद कुछ पुराने दिन याद आ गए....

आज बहुत दिनों बाद कुछ पुराने दिन याद  आ गए....
दिन नहीं , साल, दशक, या फिर कुछ पीढियां ...
थोड़ी सी लाचारी , और बहुत सी शर्म आई....
शर्म आई, अपने पुरखों पर...
अब पुरखे, धर्म से नहीं बंटे हुए....
बात हो रही है १९४७ के दंगों की
दंगों की , जब सांझे चूल्हे टूट गए...
पुश्तों से जुडी , सान्झेदारियां टूट गई
पाकिस्तान से हिंदुस्तान, और हिंदुस्तान से पाकिस्तान
लाशों से भरी गाड़ियाँ पहुंची
लाखों औरतें या तो कुओं मैं डूब गई,
अपने पिता या पति द्वारा क़त्ल कर दी गई...
ताकि उनकी इज्ज़त बच सके....
फिर भी लाखो औरतें अपनी इज्ज़त नहीं बचा सकी....
क्या था उनका कसूर....
सिर्फ यही की वो राम या रहीम को मानते थे
या फिर रोज़े या व्रत रखते थे....
कब हम समझेंगे की ये सही नहीं है

Tuesday, June 28, 2011

मेरे दुःख, और मेरी तकलीफें....

तेरा कुछ भी कह देना .
और मेरा कुछ भी सह लेना...
कुछ और नहीं , बस प्यार है ये...
जो मुझ को जिंदा रखता है...

दिल की बात छुपा जाना
और झूठ मूठ बहला जाना...
जान बूझ के भी उल्लू बन जाना
कुछ और नहीं, बस प्यार है ये....
जो मुझ को जिंदा रखता हैं....

मेरे दुःख, और मेरी तकलीफें....
हर बात में ' मैं ' का आ जाना ....
सोचते रहना हर पल का..
'हम ' का कभी ज़िक्र भी न आना....
सब जानते बूझते हुए भी...
हमारा अदब से झुक जाना 
कुछ और नहीं , बस प्यार है ये....
जो मुझ को जिंदा रखता हैं...

इंतज़ार बड़ा, और याद बड़ी...
दिन भी है बड़ा, और रात बड़ी...
क्या गलती थी जो मुझ से हुई...
दिन रात ये सोचने मुझ को भी....
हर पल ये खाया करती हैं....
कुछ और नहीं,  तकलीफें है....
जो हर पल मारा करती है...

Wednesday, June 22, 2011

विरह बहुत तकलीफ देता हैं..

ज़िन्दगी इतनी आसान नहीं है...
ये तो मुझे मालूम ही था...
आखिर आसानी से कुछ नहीं मिला मुझे....
लेकिन इतना भी तकलीफदेह हो जायेगा,,,
ये न पता था ...
मन बहुत विचलित सा रहता हैं....
काम मैं मन नहीं लग रहा ....
नहीं जानता क्या होगा आगे....
बस यही जानता हूँ की विरह बहुत तकलीफ देता हैं....
हालात उस तरह के मालूम होते हैं...
जैसे भूखे के आगे से रोटी उठा ली जाए ..
मां से उसका बच्चा छीन लिया जाए ....
और...रोने को दिल करे पर हँसना पड़ जाए....
कहाँ हो तुम.....

Thursday, June 16, 2011

शायद वो भी मेरे इन्तेज़ार को , मेरी किस्मत की तरह मुझे भूल गए हैं....


मैंने फोन किया 
एक दफा....
किसी ने नहीं उठाया
फिर फोन किया 
घंटी बजती गई...
फिर किसी ने फोन उठाया 
कहने लगे, वो तो पूजा कर रहे हैं...
आपको बाद में करेंगे फोन...
में हैरान था...
सोचा चलो, कोई बात नहीं ... 
ये भी तो ज़रूरी है 
भगवन जी को भी खुश रखना है...
१० मिनट १५ मिनट. आधा घंटा 
अब शायद १ घंटा होने को है....
लेकिन कोई फोन नहीं आया....
शायद वो भी मेरे इन्तेज़ार को , मेरी किस्मत की तरह मुझे भूल गए हैं....

Wednesday, June 15, 2011

और मजबूर करने वाले वो, जिनका फैसला गलत हैं..

आज दिल बहुत परेशां हैं....
भाग जाना चाहता हूँ सब कुछ छोड़ कर 
ज़िन्दगी में एक बहुत बड़ा पल आता हैं 
जब आप पति से पिता बन जाते हैं...
हमारी ज़िन्दगी में भी ऐसे पल आयेंगे ....
सोचा तो है....
उस पल को जीने के लिए चाहता हूँ की उस वक्त अपने जीवन साथी के साथ रहूँ...
बहुत कोशिश की....
चाहा की दफ्तर की तरफ से हो जाए ...
छुट्टियाँ हों पास....
पैसों का भी इंतज़ाम किया....
ज़िन्दगी में पहली बार एक कोट पैंट  सिलवाया....
इतने कागज़ इकठे किये, की जैसे ही कोई मांगेंगे तो दिखा देंगे...
के ये देखो , में सच्चा हूँ... 
लेकिन हम लोग जब बाहर की दुनिया का सामना करते हैं...
तो बहुत से चीज़ों का सामना करना पड़ता हैं....
जो हम कर नहीं पाते....
हमें इनकार कर दिया जाता हैं...
जिसके हम अधिकारी नहीं होते 
सब कुछ है मेरे पास..
लेकिन, आप नहीं हो...
और एक डर भी , की मैं वहां नहीं हो पाउँगा....
और मजबूर करने वाले वो, जिनका फैसला गलत हैं.....

Monday, June 13, 2011

एक एक जज्बात, गर्म रेत पर भाप बन कर उड़ा देता हैं

मेरे साथ ही अक्सर ऐसे क्यूँ होता है...
सब होते होते भी ,तू मुझ से सब छीन लेता हैं
दिल मैं दर्द सा भर कर , तू क्यों बेज़ार कर देता हैं...
मेरे जज्बातों का समंदर, क्यूँ रेगिस्तान मैं उड़ेल देता हैं .
एक एक जज्बात, गर्म रेत पर भाप बन कर उड़ा देता हैं
उनसे कहने को कहता है... जिसके सीने मैं पत्थर देता है...
बिना सुने,मेरी भावनाएं, वो खिलाफ फैसला देता हैं...
मैं रोता नहीं, चिल्लाता नहीं, एक पत्थर सा हो जाता हूँ...
ये सोच कर, की मेरी तकलीफ , "उसे" तकलीफ देगी बहुत...
मुस्कुराता हूँ, हलके से उड़ा कर बातों को, सब सही होने का आभास देता हूँ
लेकिन....
अगले ही पल, उस से मिल न पाने का गम, दूर नहीं होता....
और मैं, अमानुष, अगले ही पल... बिखर जाता हूँ...
और भगवन, क्यूँ मुझे खुश होने नहीं देता हैं....


Monday, June 6, 2011

शायद यही प्रेम है...

प्यार किसे कहते हैं ...
क्या ये पास होने का नाम हैं .
छूने के, अभिव्यक्त करने का ...
महसूस करने का....
प्रेयसी की गोद मैं सर रख के सोने का...
या फिर सीने से लग कर, अपने ग़मों को कह देने का....
या फिर, धोखे के बाद भी , उसका भला चाहना....
क्या है प्यार....
प्रतिशोध तो प्यार मैं नही होता,,,
तो फिर लोग कैसे कहते है, उसने मुझे धोखा दिया....
अब मैं उसे कहीं का नहीं छोडूंगा
वही इंसान जो आपके लिए ज़िन्दगी से बढकर होता है...
एक पल मैं दुश्मन लगने लगता है .....
ज़िन्दगी शायद उठीं सीधी भी नहीं....
जैसे कभी कभी लगती है....
खैर प्रेम से ज़िन्दगी तक पहुँच गए....
लेकिन जब दूर हो...
तब
तब कैसे हो प्रेम....
जानते हुए की बहुत दूर हूँ....
सिर्फ अपने आप को दिलासा देना....
बस थोडा वक्त रह गया....
जानते हुए, की जो बीत गया उसे से ज्यदा हैं ...
फिर भी...
शायद यही प्रेम है....
जो बहुत दूर है, उस के मिलने की आस....
शायद यही प्रेम है...

Sunday, May 8, 2011

आंसुओं की धारा अविरल बह रही है ..

पिता क्या है 
कही कुछ दिन पहले ॐ व्यास की कविता सुन रहे थे 
कह रहे थे ...
पिता छत है , पिता आसमान है 
पिता है तो, हम सब का सम्मान है 
कुछ ऐसा भी था....
पिता है तो दुकान के सब खिलोने हमारे हैं ....
पापा बीमार हैं...
कुछ कुछ उन्हें भी आभास है...
हम भी अनिष्ट से कुछ चिंतित हैं ...
जान की फिकर नहीं....
लेकिन पैर की चोट है...
उम्मीद है सब ठीक हो जायेगा...
कल डॉक्टर पट्टी खोलेंगे तो पता चलेगा...
पर पता नहीं क्यूँ मन परेशां है 
और आँखों से आंसुओं की धारा अविरल बह रही है ..


Wednesday, April 27, 2011

बिस्तर पर चादर में पड़ी सलवटें...

वो भी क्या मनहूस दिन था....
जिस दिन तुम चले गए....
चले गए, अपने पीछे छोड़ गए यादें...
वो खुला हुआ दरवाज़ा...
बिस्तर पर चादर में पड़ी सलवटें...
रोशनदान से झांकती चाँद की किरणें..

मैं अब भी अलमारी को ज्यादा देर खुला नहीं छोड़ता
तुम्हारे साज सिंगर की खुशबू अभी भी ताज़ा है उसमें...
कोई नहीं आता अब हमारे कमरे मैं...
तुम्हारे सिवा किसी को आने का हक़ नहीं दिया...

हर रोज़ पड़ता हूँ, जनम दिन पर भेजी हुई मुबारकें...
डायरी पर लिखे कुछ पेज...
और उन पर लिखी तुम्हारी लिखावट...
सब वहीँ है......
छू कर उसे, महसूस करता हूँ , तुम्हारे हाथों को...




























 
जब तक तुम थी, तब तक हर दिन बसंत था....
हर पल सावन था,,,,
अब तुम नहीं तो , हर तरफ पतझड़ लगता है...
हर मौसम, बिगड़ा सा लगता है...
जब गए थे, तो लगा कुछ वक्फे की बात है....
अब तो लगता है, की वक्फा बढता ही जाता है....
कब बीतेगा ये वक्त, और कब होंगे हम एक....

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है....

कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो लगते हैं... जैसे बस अभी किसी ने कहे हों....

Monday, April 25, 2011

आप हो तो मैं हूँ....

कितनी आसानी से कह दिया...
की मुझे ख़ुशी नहीं.....
शायद कह नहीं पाता
या आप समझ नहीं पाते...
कहता कुछ और हूँ...
समझते कुछ और हो....
घर से, दफ्तर से छुट्टी लेने की कोशिश कर रहा हूँ...
सोच रहा हूँ, की वीसा लग जाए...
तो शायद जा सकूँ....
कौन पिता नहीं चाहता की वो अपनी औलाद के पास हो....

जब बात करते हो...
मैं,
मेरे माता पिता,
मेरा बच्चा ,
इधर की सुविधाएँ...
सब कुछ "मैं"

बाकी लोग कुछ नहीं.., उनकी कोई इच्छा नहीं...उनकी कोई चाहत नहीं....किसी की चाहत का, अरमान की कोई कीमत नहीं....

आपकी इच्छा, और अरमान की कीमत सब से ज्यादा है... इस मैं भी कोई शक नहीं, माँ होने के नाते फैसला करने का हक़ भी आपका ही है
मैं तो पहले ही कह चुका हूँ, जैसे आप सही समझो, वैसे करो...

मुझ मैं और आप मैं एक बुनियादी फर्क हैं....
मैं पहले उन सब के लिए जीता हूँ, जिन्होंने अपना सब कुछ बलिदान कर दिया मेरे लिए...
क्यूंकि सोचता हूँ, की माता पिता कोई बहुत ज्यादा वक्त के लिए नहीं रहते...अभी वो ६०-७० के हो गए.. शायद १० साल और या फिर १५ साल.. क्या उस के बाद उनके लिए कुछ कर सकूँगा ...
मैं कुछ नहीं कर सकूँगा, तो चाहता हूँ की उन को खुश रख सकूँ...
मेरे जैसे लोगों के लिए दुनिया नहीं है, या यूं कह लें की मैं इस दुनिया मैं फिट नहीं हूँ...

आप सब से पहले अपने लिए जीते हो, जो सही भी है , सच भी है. और दुनिया चलती ही ऐसे हैं, इस में आप की कोई गलती नहीं... उलटी रीत तो मैं चला रहा हूँ....
तो आप जो कर रहे हो , सही है. 
जो कह रहे हो वो सही है
जो कहोगे वो सही है...
और सब से बड़ी बात...
आप हो तो मैं हूँ.... 

Sunday, April 24, 2011

आज़ाद हो, अपनी सोच के लिए, और अपने हिसाब से कुछ भी फैसला करने के लिए....

एक लड़की की ज़िन्दगी पूरी तरह मजबूरी से भरी होती है....
पैदा होते है, पिता कई  दफा बोझ समझ लेते हैं...
उसे समझाया जाता है...
बोझ हो तुम,...
परायी हो.., पराये घर  जाना है....
कुछ साल बीत जाते हैं....
फिर भाई बड़े हो जाते है...
फिर भाइयों की बात मान लेनी पड़ती है..
ये करो, वो करो
या नहीं करना,
यहाँ नहीं जाना....
सारी दुनिया की बंदिशें....
फिर शादी....
लकड़ी सोच के आती है...
ये मेरा घर है अब
ये इंसान तो समझेगा...मेरी बात....
लेकिन यहाँ भी वही
अब नए घर के लोगों के अनुरूप ढल जाओ ...
अब पति की मर्ज़ी से रहो....
कितना गलत है...
लेकिन क्या हर दफा ज़बरदस्ती होती है....
नहीं जानता गलत है , या सही है....
मैं तुम्हें सारी जिम्मेवारी और मजबूरी से आज़ाद करता हूँ...
कोई ज़रुरत नहीं , बोझ लेने की...
किसी  की भी वजह से तनाव मैं रहने की...
आज़ाद हो, अपनी सोच के लिए, और अपने हिसाब से कुछ भी फैसला करने के लिए....
बस एक ही उम्मीद है, और गुज़ारिश है....
हमेशा खुश रहो.....  

Friday, April 22, 2011

कहाँ हो तुम!!!!!!!!!!!!!!!!!

कल जल्दी से आ गया.....
सोचा की आप भी जल्दी से आ जाओगे, और फिर बात करेंगे....
लेकिन सपने और सच में दूरी होती है....
आप नहीं आ पाए...
फ़ोन पे ही हुई बात....
मुझे समझाते रहे...
ऐसे नहीं करते....
ऐसे नहीं सोचते....
में तो सारी उम्र समझाती ही रह जाउंगी....
और हम एक छोटे बच्चे की तरह कहते रहे...
जी, 
रात को नींद नहीं आई, तो जागते रहे....
की अब आएगी खबर, तब आएगी खबर....
रात २ बजे के करीब फ़ोन आया...
कहने लगे, हो गया जी काम....
हम खुश हुए, दिन अच्छा बीते ऐसे दुआ की
और सो गए....
सुबह ६ बजे उठे, सोचा की चलो आज करते है बात
अचानक फ़ोन करेंगे, और उन्हें हैरान कर देंगे....
लेकिन ऐसे हो न सका....
फ़ोन पिछले ३ घंटो से कोशिश कर चुका हूँ...
लेकिन फ़ोन नहीं मिल रहा 
पता नहीं क्यूँ नही बात हो रही....



Friday, April 15, 2011

बहुत याद आ रही हो आज....

जब हम मोहब्बत करते हैं तो चाहते हैं ..
हर पल साथ होना....
हर पल प्रेम के होने का एहसास करना
एक अदने पुराने प्रेमी की तरह  सोचना
"तेरी बाहों मैं ज़िन्दगी गुज़र जाए"
लेकिन जब प्रेम तो हो, पर दूर हो..
तो क्या किया जाए,
ना तो रहा जाए, न जाया जाए......
क्या किया जाने...
बस याद किया जाए...
और विरह के पलों मैं मोहब्बत की यादों को जिया जाए...
क्या ये मुमकिन है....
मेरे लिए तो मुश्किल है....
बहुत याद आ रही हो आज.....

Monday, April 4, 2011

सब निशां मिटा दिए....























आप जा रहे थे....
हम ने कहा, इसे भी ले जाओ  
शायद काम आये,,,,
आप हंस दिए....
कहने लगे, है मेरे पास और....
हम मन मसोस कर रहे गए...
लगा शायद आप सही कर रहे हो..
वक्त गुज़रा हम किताबों के पुराने पन्ने पलटने लगे....
सोचा कोई हमारी याद इन सब में दबी होगी...
वो याद जो हमें और खुश कर देगी...
एक मुड़ा तुड़ा सा कागज़ निकला....
जिस में अनचाही सी यादें थी...
जो गुज़र गई, अच्छी भी न थी...
सीने में से जो गुज़र गयी, सुइओं जैसे
फिर इक दिन हमने ठान लिया,
इस सब को स्वाहा कर देंगे...
आज ये हमने काम किया....
सब पुरानी यादें मिटा चले,
अनचाही बातें मिटा चले...
चाहें भी कभी तो देख न सके...
सोचे भी कही तो सुन न सके
उन सब अनचाही यादों के..
पन्नों को हम जो मिटा चले....
तेरे खातिर, तेरे प्यार के लिए...
हम अपना सब कुछ लुटा दिए...
जो भी थे, कुछ अनचाहे
वो सारे निशां मिटा दिए...

Friday, April 1, 2011

मोरा सैय्याँ मो से बोले ना

मोरा सैय्याँ मो से बोले ना, मैं लाख जतन कर हार रही

Sunday, March 27, 2011

यूँ कभी न कहना मुझ से, क्यूँ किया है मुझ से प्यार


तू मेरा शौक देख, और मेरा इंतेज़ार
यूँ कभी न कहना मुझ से, क्यूँ किया है मुझ से प्यार

तू ही तो है मेरी इच्छा, वजह जीने की मेरी
सपना है आखों खुली का, बहके दिल का है खुमार

ये ज़रूरी तो नहीं , वजह हो हर चीज़ की
हीरे मोती सब हैं मिटटी , बेशकीमत तेरा प्यार

जिंदगी तो साथ मेरे, मौत तक रह पाएगी
बस तू है जो संग मेरे, आखरी तक जायेगी

अखिओं के झरोखों से.....

इक बहुत ही खूबसूरत ग़ीत...
एक बहुत खूबसूरत इंसान को समर्पित....
आपको बहुत पसंद है....मुझे भी....

Friday, March 25, 2011

साथ नहीं दोगे मेरा?

 कुमार विश्वास का कहा याद आया कुछ आज....
"तू मुझ से दूर कैसी है, मैं तुझ से दूर कैसा हूँ....
ये मेरा दिल समझता है, या तेरा दिल समझता है "

बहुत से फैसले ज़िन्दगी में बहुत मुश्किल से लेने होते हैं...
हम नहीं भी चाहते, फिर भी हमें वो करना पड़ता है....
क्योंकि कुछ पलों की तकलीफ से,
अगर हमें लम्बे वक्त तक अपनों का साथ मिले, 
तो उस में बुरा क्या है....
ये कहना आसान है करना मुश्किल है...
जानता हूँ, लेकिन शायद सब का भला इसी में है...

कुछ मेरी बातें आपको तकलीफ देती है आपको...
कभी मेरे हालात भी समझने की कोशिश कीजियेगा..
इतने संघर्ष के बाद दूर नहीं रहना चाहता...
बस यही एक गुजारिश है, की मेरे भी हालात समझें....
मैं सब कुछ भुला कर अपनी आगे वाली ज़िन्दगी को देख रहा हूँ...
साथ नहीं दोगे मेरा?
कब तक , चुप रहोगे.. दुखी रहोगे...
कह कर फ़ोन न करोगे....
कब तक रूठे रहोगे, और मेरे धैर्य की परीक्षा लेते रहोगे...

अगर ज़िन्दगी, परिवार, जीवन साथी... 
सभी हर कोने से दबाने लगेंगे...
हर किसी को समझाना पड़े...
और कोई भी समझना न चाहे...
तो कब तक चलेगा सब...

इन सब चीज़ों, में मैं कहा हूँ...

Friday, March 18, 2011

बस भूलने की आदत बची रहे

कुछ सुख जो कभी लौट कर नहीं आयेंगे
कुछ दुःख जो कभी छोड़ कर नहीं जायेंगे
मगर भूल जाने की आदत हमें हमेशा बचा लेगी
बस भूलने की आदत बची रहे

बहुत खूब लिखा है किसी ने.....

Thursday, March 17, 2011

दाग अच्छे हैं.....

हम सभी गलतियाँ करते हैं...
छोटी गलती, बड़ी गलती....
कर के भूल जा सकने वाली गलती,
कभी भी न भुला जाने वाली गलती,
सीने में दर्द पैदा करने वाली गलती,
लेकिन अब गलती तो हो गई भाई...
अब क्या करें....
मैंने ज़िन्दगी मैं दो ही तरीके देखे इसका मुकाबला करने के....
या तो उस गलती को खींचते रहो...
कहते रहो, मैं लुट गया, ये मैंने क्या कर दिया, अब क्या होगा..
पश्चाताप की आग मैं जलते रहें....
ना खुद खुश रहें, ना औरों को रहने दें...
यानी ज़िन्दगी का बेडा गर्क....


























 


या फिर, ये सोचें, वक्त बुरा था, हालात साथ नहीं थे...
गलतियाँ तो सभी करते है, बुरा ये नहीं की हम गलती करें,
बुरा है, की उस से सीखें ना...
बुरा है की उसे खींचते रहें...
अब जो हो गया, उसे बदल तो नहीं सकते हम...
वक्त की घडी सिर्फ एक ही दिशा मैं चलती है
उसे घुमा के पीछे नहीं कर सकते...
तो फिर, ये सोचने की क्या दिया है , उस परम पिता परमात्मा ने हमें....
सोचें, की अब दोबारा ऐसे नहीं करेंगे... और सब तरफ ख़ुशी फैलाएं....
बस यही तरीका है,,,,और सही तरीका हैं....
गलतिओं के दाग होने से ही समझ आती है, 
कि इसे अब दोबारा नहीं करना और ऐसे करने से नुक्सान ही होता है 
इस लिए यही कहूँगा की दाग अच्छे है...
आखिर चाँद मैं भी दाग है, और सारी दुनिया मैं हर प्रेमी उसे अपनी प्रेयसी से मुकाबिल करता है....

तो वो ज़िन्दगी कैसे गुज़ारे,,,

अगर आप अच्छे हैं तो साथी अच्छा ही मिले ये ज़रूरी तो नहीं...
आखिर भगवन जी ने कौन से गिन कर अच्छे और बुरे लोग बनाये हैं...
उन्होंने तो इंसान बनाये थे, लोग शैतान बन गए, हैवान बन गए....
फिर जब गिने चुने ही हो लोग, तो हो सकता है अच्छे को बुरा मिल जाए....
या बहुत बुरा मिल जाए....
तो वो ज़िन्दगी कैसे गुज़ारे,,,, शायद वक्त बहुत बड़े घाव भर देता है....
लेकिन कितना लगेगा वक्त...

Tuesday, March 15, 2011

दूसरा विकल्प

कहते है किस्मत से ज्यादा और वक़्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता....
सच है जी, सौ फीसदी सच है..
और जो मिलेगा, वो भी भगवन फैसला करते है....
कुछ लोग उसके लायक होते है, और कुछ हमेशा नालायक ही होते हिया....
हम दूसरी श्रेणी मैं विचारने वाले प्राणी है...
वैसे हमें कभी नहीं लगा की हमें दूसरी श्रेणी मैं होना चाहिए,
लेकिन, भगवन से तो नहीं लड़ सकते न....
घर मैं हम से बड़े दीदी थी....
तो सब के लाडले थे...
ये तो नहीं कहता की हम से बहुत ज्यादा प्यार करते थे...
लेकिन शायद मैं दुसरे नंबर का ही था....

पढाई करने गए, पापा इंजिनियर नहीं बन पाए.....
सोचा था डिग्री करेंगे, और उनका सपना पूरा करेंगे...
बीमार हो गए, बारहवीं में
डिग्री रह गई, डिप्लोमा ही करना पड़ा...
कॉलेज में टॉप किया ...
और बस वहीँ के नोटिस बोर्ड पर ही है हमारा नाम....
श्रीमान ने ज़िन्दगी के ३ साल बर्बाद कर के सब से ज्यादा नंबर अर्जित किये...
जब कभी गलती से भी उस जगह चला जाता हूँ,
और अपना नाम लिखा देखता हूँ बहुत नफरत होती है...
ज़िन्दगी में कभी उस की बदौलत नौकरी नहीं मिली....
पढाई लिखाई से इंजिनियर थे, लेकिन काम किया पेच कसने का ३ महीने....

नई नौकरी की, तो टाइपिस्ट बन गए...
ज़िन्दगी के ३ साल घिसा दिए, तो ४०००० रुपये इकठे हुए....
पिता जी को कहा, मोटर साइकिल ले दो...
लेने गए तो, जिस रंग की लेनी थी मिली नहीं,
दूसरी मिली, ध्यान से नहीं देखता, पुरानी ही ले आये...
शायद कोई पहले ही चला चूका था,
एजेंसी वाले धोखा कर गए,
यहाँ भी भगवन जी धोखा कर गए....

फिर नौकरी करने लगे...
नयी जगह गए, US का वीसा लगने की तैय्यारी थी...
दूसरी टीम, से एक बॉस अड़ गए..
कहने लगे , मेरी टीम से ही जाएगा एक बन्दा
यहाँ भी रह गए....दूसरा विकल्प

जीवन साथी मिले, वो भी बहुत मुश्किल से फैसला कर पाए...
शायद उनकी पहली पसंद को उनका परिवार न मान पाता..
और हम से भी शादी की बात चल रही थी....
है न एक दम फ़िल्मी स्टोरी....
हम खुशकिस्मत है, की वो हमें मिले...
यहाँ पर भी दूसरा विकल्प
पता चले किसी दिन, यमराज भी उठाने आयें...
तो कह दे, किसी और को उठा लो
यह तो है ही दूसरा विकल्प....
सब चाहेंगे, की ऐसा ही हो...

लेकिन प्रभु, बाकी सब गलतियाँ मंज़ूर...
ये गलती मत करना, पहली पसंद ही रखना मुझे....

लगता है किसी दिन ऐसे ही ढह जाऊंगा....

जब मैं छोटा था... तो सब कहते थे...हमें सच बोलना चाहिए
अच्छे इंसान बनना चाहिए... किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए....
अगर कोई गलत करे, उसे माफ़ कर दो,
माफ़ करने वाला गलत करने वाले से बड़ा होता है...
हम कौन होते है किसी को सजा देने वाले, भगवन उसे सज़ा देगा...
बड़ा हुआ, संस्कारों ने, हालत ने, वक्त ने ऐसे ही सांचे में ढाल दिया....
ज़िन्दगी के ३ दशक  साल निकाल दिए, किसी का बुरा नहीं चाहा
ज़िन्दगी ने बहुत सबक सिखाये, हर बार सोचा, नहीं ऐसे थोड़े होता है....
भगवन सब ठीक करेंगे.....
यहाँ पर राम की नहीं, रावण की पूजा होती है....
मैं गलत था, अच्छा नहीं होना चाहिए....
सब लोग लूट के खा लेने की कोशिश करते हैं.
ज़िन्दगी  मानो, गिद्धों का डेरा है...
जो जिंदा इंसानों का मांस खा लेना चाहती है....
शायद बहुत कुछ खा चुकी है मेरा....
ऊपर से सब ठीक दिखाई देता है....
लगता है किसी दिन ऐसे ही ढह जाऊंगा....
जब तक जिंदा हूँ, चाहता हूँ अपने उसूलों से न भटकूँ....
सही को सही, और गलत को गलत ही कहूँ...
और ऐसा कुछ न करूँ, जिस के लिए मेरी आत्मा को,
मेरे आस पास वालों को, आत्म-ग्लानि न हो...
प्रभु मुझे शक्ति दो....

Monday, March 14, 2011

फिर उस से मिले, जिस की खातिर बदनाम हुए,


फिर उस से मिले, जिस की खातिर बदनाम हुए....
बदनाम हुए, बदनाम हुए...

थे खास बहुत, अब तक आली,
अब आम हुए, बदनाम हुए....
फिर उस से मिले जिस की खातिर बदनाम हुए
बदनाम हुए, बदनाम हुए...

दो लम्हे, चांदनी रातों के ,
दो लम्हे, प्यार की बातों के,
इलज़ाम हुए, बदनाम हुए
फिर उस से मिले, जिस की खातिर,
बदनाम हुए, बदनाम हुए...

यूँ तो न गई, वहां कोई खबर
पर आहों के , खामोश असर
पैगाम हुए, बदनाम हुए..
फिर उस से मिले, जिस की खातिर
बदनाम हुए, बदनाम हुए...


यूँ तो न दिए, कुछ सुख हमको
पर उनसे जो पहुंचे , दुःख हमको
ईनाम हुए, बदनाम हुए....
फिर उस से मिले, जिस की खातिर
बदनाम हुए, बदनाम हुए...

जब होने लगे, ये हाल अपने
सब रोशन , साफ़ ख्याल अपने.
इबहाम हुए, बदनाम हुए
फिर उस से मिले, जिस की खातिर,
बदनाम हुए, बदनाम हुए...


थे खास अब तक आली, अब आम हुए
बदनाम हुए, बदनाम हुए...
फिर उस से मिले, जिस की खातिर,
बदनाम हुए, बदनाम हुए...
(एक ग़ज़ल जिसे  गुलाम अली ने आवाज़ दी है...)





Thursday, March 3, 2011

तुम जो नहीं हो पास मेरे...

तुम जो नहीं हो मेरे पास....
तो सारा आलम उदास है....
चुप सी है वो सब चिड़ियाँ ...
और सोया गुलाब है....
तुम जो नहीं हो पास  मेरे...
तो सारा आलम उदास है....

बादल भी है डरा डरा....
और बारिश भी बहकी सी....
सब कुछ जो है, बस आम है...
कुछ भी न ख़ास है,
तुम जो नहीं हो पास  मेरे...
सारा आलम उदास है....

सुबह सोयी..., रात बहकी...
दोपहर सुनसान है....
शाम है, शमशान जैसी....
मुर्दों सी आग है....
तुम नहीं जो पास मेरे,
सारा आलम उदास है....

Wednesday, March 2, 2011

वो आँखें ... पीछा करती है..

मिलना जुदा होना यही नियति है...
यही सच है...
बाकी सब झूठ...
तुम्हारी आँखें मदहोश करती हैं...
चाहे सारी उम्र उन्हें देख कर गुज़ार दूं...
पर कल......
कल तुम्हे छोड़ने आया था....
साथ मैं गुज़ारा एक एक पल, याद रहेगा हर पल...
घर से चलना...
वो हाई वे के ढाबे का खाना....
चायनीज़ नूडल्स , फिर दाल मखनी  , साथ में प्लेन नान .... सेहत का भी तो ध्यान रखना है आपको....
और आखिर में देसी घी की इमरती....
दिल्ली का एयर पोर्ट ... पार्किंग....
और बाहर गुज़ारे १०-१५ मिनट....
नहीं चाहता था की की तुम इतनी जल्दी अन्दर जाओ....
तुम भी तो नहीं चाहती थी....
लेकिन, फिर देर हो जाने का दर. कुछ गलत होने का दर....
अकेली जो जा रही थी....
तुम्हें अन्दर भेज दिया... 
बाहर साथ साथ चलता रहा....
और साथ चलती रही कांच की दीवार...
अचानक तुम गायब हो गई....
मैं घबरा गया, फ़ोन किया...
आपने फ़ोन नहीं उठाया
एक बार
दो बार
सोचा घंटी नहीं बज रही होगी...
शायद सीलेंट पर है फ़ोन...
फिर फ़ोन किया
इस बार आप ने उठा लिए.....
शुक्र है भगवन का...
आपकी आवाज़ सुनी...
कहें लगे, बुधू यहाँ नही २ नंबर पर हूँ....
फिर मैं उधर आया...
आप नहीं आये १० मिनट
२० मिनट 
फिर फिकर होने लगी...
क्या करूँ पागल हूँ न फिकर करता ही रहता हूँ....
फिर आप आये..
मैं , आप और हमारे बीच में एक काच की दीवार..
कुछ लम्हे बात हुई....
फिर मेरा मन भर आया...
नहीं चाहता था की आप सारा सफ़र रो के निकाल दो...
शायद आप भी समझ गए ..
कहने लगे, चले जाओ चाहे तो ... अन्दर तो आने नहीं देंगे....
न चाहते हो भी चल दिया... जानता था, वाही रुका तो रो दूंगा. और रो दिया तो आप सारे रस्ते आराम से न जा पाओगे....
बाहर मैं चला..
अन्दर से आप...
आप की आँखें मानो शीशे को चीर कर कह रही थी...
मत जाओ....
कुछ दफा मुड़ कर देखा...
एक बार मुदा तो आप नहीं थे...
शायद किसी कोने में छुप गए...
जानते थे कि ऐसे जा ही नहीं पाऊंगा...
मैं वहां से निकल आया...

लेकिन अब भी
वो आँखें.... पीछा करती हैं......

Wednesday, December 22, 2010

लेकिन याद आएगी, उन सब की

वो हमारे साथ काम करते थे...
कई साल से....
एक ही जगह बैठना, बातें करना, खाना खाना, फुर्सत मे गप्पें लड़ना या फिर कभी हों सके तो खेल लेना...

यूँ ही बातों बातो में एक साल हवा के झोंके सा आया और चला भी गया... मालूम ही ना चला कब वक्त बीत गया...
परसों की की बात है, पता चला वो सब चले गए...
ऐसे कैसे चले गए? पता चला मालिकों को लगा की वो काम अच्छा नहीं कर रहे थे,
पर सब के सब, एक साथ?
आज २ दिन हुए, जब उस तरफ जाता हूँ, दिल कलेजे को आता हैं...
एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है हर तरफ...
एक बार गया , दोबारा उधर जाने को दिल नहीं किया....
कितनी बेरहम दुनिया है, और जिन्हें अपना समझते है..
एक पल में दूर हों जाते हैं, पता भी नहीं चलता....
कुछ और दिन है, फिर हम दूसरी जगह चले जायेंगे...
लेकिन याद आएगी, उन सब की....
बहुत याद आएगी......

कभी कभी सब कुछ सपने सरीखा सा लगता है....

कभी कभी सब कुछ सपने सरीखा सा लगता है....
लगता है कल की की बात है, जब तुम्हारा इंतज़ार था....
पास होना, एक अनबूझ सी पहेली सा लगता था....
और आज, तुम मेरे पहलू में बैठी हों....
तुम्हें छू सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ.....
खुद को चिकोटी काट लेता हूँ...
सच... हों ना तुम......

Saturday, June 5, 2010

सब खुद में खो गए, और मैं अकेला रह गया ....

दो इंसान सालों एक दूसरे के साथ रहते हैं...
कभी कभी मुझे तुम्हारी कुछ बातें अच्छी नहीं लगती....
शायद तुम्हे भी मेरी बहुत सी बातें अच्छी नहीं लगती...
पर  में तुम्हें नहीं छोड़ना नहीं चाहता....
क्यूंकि जानता हूँ, की कोई भी मुझे ऐसा नहीं मिलेगा जिस में कोई कमी ना हों....
प्यार करता हूँ, और कोशिश करता हूँ जैसी हों कबूल कर पायूं
कुछ पलों के लिए दूर हों जाना चाहता हूँ, जब खुद को संभाल ना पायूं
नहीं जानता क्यूँ, खुश नहीं हूँ पाता
सब को खुश रखना चाहता हूँ, और जब हम सब को खुश करना चाहते हैं, शायद खुश को खुश नहीं रख पाते

"जो भी मेरे पास था, वो नाम सब के कर दिया....
सब खुद में खो गए, और मैं अकेला रह गया ...."

Saturday, May 22, 2010

यूँ ना रह रह कर हमें

आज तुम्हारी याद आ रही है....
तुम से बात भी कर रहा हूँ
बहुत कुछ कहना चाहता हूँ
पर शायद तुम्हारा मूड ठीक नहीं है....
शायद जल्दी ठीक हों...
उस दिन के इंतेज़ार में ....

Saturday, May 1, 2010

कमरे की खिड़की में वो काले रंग का कांच

आज तुम नहीं आये..
दिन मे एक दर्द सा समेटे हम ने
फ़ोन को कष्ट दिया,
आपका नंबर किसी खूबसूरत से सपने के जैसे आया
घंटी बजी, लेकिन......
उफ़ कोई नहीं था उठाने वाला ....
क्या दिन ऐसे ही गुज़र जाएगा,
क्या सपना ऐसे ही बिखर जायेगा...
मेरे कमरे की खिड़की के कांच का रंग काला है....
उसके पार रात को कुछ दिखाई नहीं देता...
क्या तुम वही हों, उस पार और रात को दिखाई नहीं देती......

Saturday, January 30, 2010

गुलमोहर का दर्द

मेरे आँगन मे है एक गुलमोहर का पेड़....
बहुत खूबसूरत लाल सुर्ख फूल लगते है...
और मुझे इस से प्यार हों गया....
सालों से मुझे इसे देखने की आदत सी हों गई....
सुबह उठाना तो सब से पहले , इन फूलों को देखना....
और रात की तन्हाई में छत पर चढ़ कर
टहनियों से बातें करना 
घंटो बीत जाते 
गुलमोहर कुछ नहीं कहता...
सुनता जाता, मुस्कुराता जाता 
लगता मानो हिम्मत बंधाता
डरो मत , मैं साथ हूँ सब ठीक हों जायेगा 
फिर एक रोज़, मैं लकड़ियाँ काटने लगा 
गुलमोहर के तने से सटा कर 
गुलमोहर का सीना छलनी होने लगा 
मैंने सोचा क्यूँ नहीं 
लेकिन गुलमोहर तो मेरा था...
वो मुस्कुराता रहा, हँसता रही....
सर्दिओं की धुप मे, गुलमोहर ने अपने पत्ते गिरा दिए 
लगा जैसे उसके आंसू गिरे हों ज़मीन पर...
पर मुझे पता ही नहीं चला....
मुझे अपने दुःख कहने से ही फुर्सत नहीं थी...
जब भी मिलता अपनी तकलीफें कहता....
और वो हँसता हुआ, मेरे सारे दर्द अपने सीने मैं समेत लेता.....
आज बहुत जोर से मैंने फिर से उसे चोट दी है 
वो मुस्कुरा रहा है, जानता है मैंने उसे बहुत तकलीफ दी है 
फिर भी मुस्कुरा रहा है
मेरा गुलमोहर....

आज मन बहुत व्याकुल है, तुम्हारे बगैर....
तुम्ही तो हों मेरी गुलमोहर

Monday, December 28, 2009

ज़िन्दगी एक नासमझ सी अभी अभी जवान हुई लड़की है....


ज़िन्दगी एक नासमझ सी अभी अभी जवान हुई लड़की है....

एक पानी का बुलबुला है...


















और एक दर्द से भरी ज़िन्दगी है....

जो कभी भी अपनी सीमा पार कर सकते है

Tuesday, November 10, 2009

क्या तुम सपना ही रह जायोगी?




ज़िन्दगी में सपनो की बड़ी अहमियत होती है... 
सपने जो सालों-साल देखे जाते हैं  
सपने जो बंद आखों से देखे जाते हैं  
सपने जो ज़िन्दगी को बदल देते हैं  
सपने जिनकी खुशबू ज़िन्दगी को महका जाती है  
सपने जो किसी की हंसी में खिलखिलाते हैं 
सपने जो किसी की मुस्कराहट में मुस्कुराते हैं 
सपने जो कभी पूरे नहीं होते 
सपने जिन्हें देखने का हक़ हमें नहीं होता 
सपने जिन्हें सामाजिक बंधन पूरा नहीं होने देते  
सपने जो सपने ही रह जाते हैं 
सपने जिन्हें टूटते हुए नहीं देखा जा सकता  
सपने जिन्हें पूरा करना सारी उम्र चाहा  
और... 
सपने जो अभी भी सपने ही लगते हैं  
क्या तुम सपना ही रह जायोगी?

Sunday, October 18, 2009

दीवाली और एक और साल....


बहुत वक्त पहले कोई मिला ....
शायद हम पैदा ही उस से मिलने के बाद हुए....
उस से पहले तो सिर्फ साँसें ही चल रही थी....
फिर एक वायदा किया....

हर साल यही लगता अगली दीवाली  साथ मनाएंगे...
साल दर साल वक्त बीतते चले गए.....
जिस्म ढलते से चले जा रहे है...
बालों मे सफेदी उभर कर आने लगी है ....
सब कहने लगे , की भाई ध्यान से....
पेट बाहर आने लगा है...
कोई कहता है, उम्र निकल रही है ....
कोई कहता है, 7  लाख कमा रहा है, अब तो कर ले....

सब के अपने सवाल...
अपने जवाब....
और इन सब के दरम्यान हम....
फिर से एक और दीवाली निकल गई....
शायद अगले बरस....
एक साथ हों,  एक हो....

Sunday, September 6, 2009

देर आयद दुरुस्त आयद

आज देखा
हे भगवन,
20 दिन हो गए...
कोई पोस्ट ही नहीं की....
माफ़ कीजियेगा...
बारिशों ने तंग कर रखा था....
कभी नहीं हुई तो मुसीबत...
और हो गई तो भिगो देती है. तो भी मुसीबत....
अब आप ही देखो....
पहले तो हुई ही नहीं...
मौसम विभाग कहता है, इस बार मानसून बहुत कम हुआ...
और जब जाने के दिन आये...
तो कमबख्त ऐसे बरसने लगा , की रुकने का नाम न ले....
चलिए, देर आयद दुरुस्त आयद
उम्मीद करेंगे की हमारी भी पोस्ट का सूखा ख़त्म हो जायेगां...

Wednesday, July 8, 2009

आंसू तेरे, मेरी पलकों पे, सजा दे

कुछ इस तरह तेरी पलकें, मेरी पलकों पे मिला दे
आंसू तेरे, मेरी पलकों पे, सजा दे

दिल के जज़्बात लिखे होगे

प्यार सब के लिए नही फलता
किसी ने अपने दिल के जज़्बात लिखे होगे इन सफों पर
सामान्यतः मैं अंग्रेज़ी मे लिखी किसी भी चीज़ को अपने ब्लॉग पे नही डालता
लेकिन आज इसे देखा अछा लगा ॥
तो इसे प्रकशित करने से ख़ुद को रोक नही पाया ...

Wednesday, July 1, 2009

जिसके कपड़े अब उस के जिस्म को छुपाने के लिए काफ़ी नही रहे

ज़िन्दगी ....
गरीब के हाथ से दूर हो गई रोटी जैसे मालूम होती है
ख़ुद का दर्द गरीब की सब से बड़ी बेटी जैसे लगता है....
जिसके कपड़े अब उस के जिस्म को छुपाने के लिए काफ़ी नही रहे
जो जैसे तैसे ख़ुद को बचा लेना चाहती है
लेकिन हवस के गिद्छ लूट लेना चाहते है
वो ज़िन्दगी के दोराहे पे खड़ी है....
वो न तो लुट ही सकती है
न ही बच सकती है
लुट गई तो छोटी बहनों का भविष्य भी लुट जाएगा...
बच गई, तो भी उनके पल्ले कुछ नही आएगा....
और इस सब के दरम्यान वो पिसती चली गई
ज़िन्दगी,
गरीब की सब से बड़ी बेटी जैसे मालूम होती है

Friday, May 29, 2009

सावन की पहली बरसात

आज सावन की पहली बरसात पड़ी....
वक्त से कुछ पहले...
लेकिन थी तो पहली ही...
बहुत याद आए, तुम बहुत याद आए॥

Wednesday, May 27, 2009

आ भी जा.. आ भी जा

कभी शाम ढले तो मेरे दिल मे आ जाना

कभी कभी डर लगता है...
अगर आप दूर हो गए....
जहाँ से बात हो हो पाये...
और इंतज़ार लंबा होता चला जाए...
उम्रों से लंबा इंतज़ार
सच तो ये है
की ऐसे हो नही सकता....
लोग कहते है की जिस्मों से जुदा हो गए तो दूर हो गए...
सच तो ये है, की यहाँ भी एक है....
वहा तो सब बन्धनों से मुक्त होंगे....

दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा

Monday, May 25, 2009

किस्सा हम लिखेंगे ..

लफ्ज़ जो दिल के बेहद करीब है...
बहुत कम लोगों के लिए सच होते है...
जिनके लिए होते है वो खुशनसीब होते हैं....

Sunday, May 24, 2009

मां सुनाओ मुझे वो कहानी, जिस मे राजा न हो न हो न हो रानी

मां सुनाओ मुझे वो कहानी, जिस मे राजा न हो न हो न हो रानी
पिताजी को बहुत पसंद है...
मुझे भी....

Saturday, May 23, 2009

जब से तुमको देखा है सनम....

रिश्तों के नाम

कभी कभी रिश्तों के नाम नही होते...
या यं कहें लोग उन रिश्तों को कबूल नही कर पाते...
लेकिन रिश्ते तो नही मर जाते....
वो लोग तो जीते हैं जिन के दरम्यान रिश्ता होता है....
वो लोग तो जीते है, जिन के लिए रिश्ता उन से बढ कर होता है....
जानते हुए की तुम पाओगे, जाता हूँ....
अपना ध्यान रखना....
कल कहा था , की सुबह आओगी तो कुछ दूँगा...
तसवीरें की थी अपलोड
सोचा था, की हैरान कर दूँगा....
शायद हर बार की तरह हैरान होने की बारी मेरी ही थी

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